इंदौर शहर में नवदुर्गोत्सव का बिगड़ा स्वरूप व्यावसायीकरण एवं बाजारवाद की भेंट चढ़ गया है। किसी समय केवल जेल रोड पर लालगली में पारंपरिक गरबा महोत्सव आयोजित किया जाकर पूरे शहर की जनता वहां भक्तिभाव से गरबा देखने आती थी। वर्तमान में गली-गली में गरबा समारोह हो रहे हैं, उनमें ज्यादातर व्यावसायिकता की चपेट में हैं। कुछ मीडिया समूह भी इस दौड़ में शामिल हैं, जो गरबा करने वाले प्रतिभागियों से लेकर गरबा देखने आने वाली जनता से मनमाना शुल्क वसूलते हैं। वहीं आयोजन स्थल पर विज्ञापन, बैनर, फूड जोन आदि लगाकर अतिरिक्त कमाई की जाती है। शहर में जो चंदाखोर गरबा पांडालों को कमाई का जरिया बना चुके हैं, लेकिन गरबा प्रदर्शन का शुल्क नहीं लेते, उन्हें छोड़ भी दें तो ऐसे मीडिया समूहों के आयोजनों का बहिष्कार करना चाहिए जो गरबा महोत्सव को करोड़ों रुपयों की कमाई का जरिया बन चुके हैं। जितनी जगह से इनके प्रकाशन हैं उतनी जगह गरबा आयोजन होते हैं तथा गरबा करने वालों, देखने वालों, विज्ञापनदाताओं, विक्रय स्टॉलों से करोड़ों रुपयों की आय कमाते हैं। शहर में यदि थोड़ा भी अनुचित होता है तो उन मुद्दों को ये प्रकाशन उठाते हैं, लेकिन उपरोक्त नवदुर्गोत्सव के व्यावसायीकरण वाले मामले में खुद ही दोषी हैं।
जाहिर है कि आम जनता इन आयोजनों का बहिष्कार करे। शहर में कई स्थानों पर शुचिता एवं नियमानुसार गरबा आयोजन भी होते हैं, उनसे हमें कोई शिकायत नहीं है। भव्य गरबा महोत्सवों में शहर के अभिजात्य वर्ग की सहभागिता से वहां अंग प्रदर्शन आदि की शिकायतें भी प्राप्त होती है। जबकि भक्ति न तो व्यवसाय का विषय है, न प्रदर्शन का। अनुचित करने वालों का बहिष्कार किया जाना एकमात्र उपाय है।
दीपक शर्मा, चैतन्य लोक | खरी (अ) खरी