नई दिल्ली। भारत के ऊर्जा आयात के स्रोतों में एक बार फिर बदलाव देखने को मिल रहा है। अमेरिका से तेल और गैस की आपूर्ति में गिरावट के बीच पश्चिम एशिया से कच्चे तेल की खरीद बढ़ी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में जारी उथल-पुथल, होर्मुज जलडमरूमध्य में जोखिम और समुद्री परिवहन की बढ़ती लागत ने भारत की ऊर्जा आपूर्ति रणनीति को प्रभावित किया है।
पश्चिम एशिया से कच्चे तेल का आयात 74% बढ़ा
सितंबर 2026 में भारत का पश्चिम एशिया से कच्चे तेल का आयात अगस्त के मुकाबले करीब 74% बढ़कर लगभग 21 लाख बैरल प्रतिदिन हो गया। अगस्त में यह मात्रा करीब 12.1 लाख बैरल प्रतिदिन थी। इस बढ़ोतरी के साथ भारत के कुल कच्चे तेल आयात में पश्चिम एशिया की हिस्सेदारी 26% से बढ़कर लगभग 39.5% हो गई।
इराक, सऊदी अरब और कुवैत से आपूर्ति बढ़ने ने इस बदलाव में अहम भूमिका निभाई। शिप-टू-शिप ट्रांसफर यानी समुद्र में एक जहाज से दूसरे जहाज में तेल स्थानांतरित करने की व्यवस्था ने भी खाड़ी क्षेत्र से तेल की आवाजाही जारी रखने में मदद की। हालांकि, होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ा जोखिम अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
अमेरिका से LNG की आपूर्ति में बड़ी गिरावट
भारत के तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) आयात में भी आपूर्तिकर्ता देशों की हिस्सेदारी बदली है। सितंबर में अमेरिका से LNG की आपूर्ति अगस्त की तुलना में 60.7% घट गई, जबकि ओमान से आपूर्ति 11.6% बढ़ी। इसके साथ ओमान भारत का सबसे बड़ा LNG आपूर्तिकर्ता बन गया।
विशेषज्ञों के मुताबिक, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और होर्मुज मार्ग से जुड़ी अनिश्चितता के बीच भारत उन स्रोतों से आपूर्ति बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, जहां से ऊर्जा की उपलब्धता और परिवहन अपेक्षाकृत सुनिश्चित हो सके।
भारत के लिए क्यों अहम है यह बदलाव?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। ऐसे में आपूर्ति में रुकावट या समुद्री मालभाड़े में बढ़ोतरी का असर आयात बिल, व्यापार संतुलन और घरेलू ईंधन कीमतों पर पड़ सकता है।
भारत की रणनीति अब अलग-अलग देशों से ऊर्जा खरीदकर किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता का जोखिम कम करने की है। हालांकि, पश्चिम एशिया से आपूर्ति बढ़ने के बावजूद क्षेत्रीय संघर्ष, अंतरराष्ट्रीय कीमतें और समुद्री मार्गों की सुरक्षा आने वाले महीनों में भारत के ऊर्जा आयात की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक बने रहेंगे।