नई दिल्ली/न्यूयॉर्क। भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार की मांग दोहराते हुए कहा है कि यदि वीटो अधिकार की व्यवस्था जारी रहती है, तो परिषद के सभी स्थायी सदस्यों को समान रूप से यह अधिकार मिलना चाहिए। भारत ने चेतावनी दी है कि नए स्थायी सदस्यों को वीटो अधिकार से वंचित रखने से परिषद में दो स्तर की सदस्यता बन जाएगी और निर्णय लेने की मौजूदा व्यवस्था में वास्तविक बदलाव नहीं आएगा।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पार्वथनेनी हरीश ने सोमवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में वीटो के इस्तेमाल से जुड़े विषय पर आयोजित चर्चा में भारत का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि निष्पक्षता और समानता की मांग है कि सुधार के बाद सुरक्षा परिषद के सभी स्थायी सदस्यों के अधिकार और जिम्मेदारियां समान हों।
अभी पांच देशों के पास है वीटो अधिकार
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य हैं। इनमें पांच स्थायी सदस्य—चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका—हैं, जिन्हें वीटो का अधिकार प्राप्त है। बाकी 10 सदस्य अस्थायी होते हैं और दो साल के कार्यकाल के लिए चुने जाते हैं।
वीटो अधिकार के तहत किसी भी स्थायी सदस्य का नकारात्मक मत कई महत्वपूर्ण गैर-प्रक्रियात्मक प्रस्तावों को पारित होने से रोक सकता है। भारत का मानना है कि मौजूदा व्यवस्था द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की वैश्विक परिस्थितियों पर आधारित है और आज की दुनिया की वास्तविकताओं तथा शक्ति संतुलन को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं करती।
नए स्थायी सदस्यों को वीटो से अलग रखने का विरोध
भारत ने कहा कि सुरक्षा परिषद में नए स्थायी सदस्यों को शामिल करके उन्हें वीटो अधिकार न देना असमानता को बनाए रखने जैसा होगा। ऐसी व्यवस्था में पुराने पांच स्थायी सदस्यों की निर्णय प्रक्रिया पर विशेष पकड़ बनी रहेगी।
भारतीय प्रतिनिधि के अनुसार, यदि वीटो व्यवस्था कायम रहती है, तो परिषद के सभी स्थायी सदस्यों को समान अधिकार मिलने चाहिए। भारत इस विषय पर अफ्रीकी देशों की साझा स्थिति का भी समर्थन करता है।
स्थायी और अस्थायी, दोनों श्रेणियों में विस्तार की मांग
भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद की स्थायी और अस्थायी—दोनों श्रेणियों में सदस्यता बढ़ाने की मांग करता रहा है। भारत का कहना है कि केवल अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने से परिषद की मूल निर्णय प्रक्रिया में मौजूद असंतुलन दूर नहीं होगा।
भारत ने एशिया-प्रशांत, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों को अधिक प्रतिनिधित्व देने की जरूरत पर भी जोर दिया है। उसका तर्क है कि 1945 में स्थापित व्यवस्था को आज की जनसंख्या, वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप बदलना आवश्यक है।
सुधार वार्ता के लिए समयसीमा तय करने की मांग
भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार से जुड़ी अंतर-सरकारी वार्ता को अधिक प्रभावी बनाने की मांग की है। भारतीय प्रतिनिधि ने स्पष्ट समयसीमा और निर्धारित लक्ष्यों के साथ लिखित मसौदे पर आधारित बातचीत जल्द शुरू करने पर जोर दिया।
भारत के अनुसार, सुधार प्रक्रिया में सदस्यता की श्रेणियों, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, परिषद के आकार, कामकाज के तरीकों और वीटो अधिकार जैसे सभी प्रमुख मुद्दों पर एक साथ प्रगति होनी चाहिए।
भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी
भारत दुनिया की बड़ी आबादी और अर्थव्यवस्था वाले देशों में शामिल है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का प्रमुख दावेदार रहा है। भारत का कहना है कि परिषद को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और प्रभावी बनाना वैश्विक शांति तथा सुरक्षा के लिए जरूरी है।
हालांकि, सुरक्षा परिषद के विस्तार और वीटो अधिकारों में बदलाव के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन सहित व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति की आवश्यकता होगी। इसलिए भारत की मांग के लागू होने की कोई निश्चित समयसीमा अभी तय नहीं है।