नई दिल्ली। भारत 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। इस बार सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब पश्चिम एशिया में जारी ईरान युद्ध ने BRICS के भीतर भी मतभेद बढ़ा दिए हैं। ऐसे में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती सदस्य देशों को एक साझा रुख पर लाने की होगी।
ईरान और UAE के बीच बढ़ा तनाव
ईरान BRICS का सदस्य है, जबकि UAE भी संगठन का हिस्सा है। युद्ध के दौरान दोनों देशों के संबंधों में तनाव बढ़ा है। UAE ने अगस्त में ईरान के साथ व्यापार और वित्तीय लेनदेन रोक दिया था। ऐसे में पश्चिम एशिया संकट पर ऐसा संयुक्त बयान तैयार करना मुश्किल हो सकता है, जिसे दोनों देश स्वीकार कर सकें।
संयुक्त घोषणा पर बनी चुनौती
BRICS में फैसले आम सहमति से होते हैं। मई में BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक भी ईरान और UAE के मतभेदों के कारण संयुक्त बयान जारी नहीं कर सकी थी। अब दिल्ली समिट में इसी चुनौती का समाधान तलाशना भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल होगा।
मोदी-जिनपिंग-पुतिन समेत बड़े नेता होंगे शामिल
समिट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन समेत कई प्रमुख नेता हिस्सा लेंगे। शी जिनपिंग का भारत दौरा भी करीब सात साल बाद हो रहा है।
तेल संकट भी बड़ी चिंता
ईरान युद्ध का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ा है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तेल व्यापार प्रभावित होने से कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई है। ऐसे में BRICS के लिए पश्चिम एशिया संकट के साथ ऊर्जा और वैश्विक व्यापार की सुरक्षा भी अहम मुद्दा रहेगी।
भारत के लिए यह समिट सिर्फ BRICS की मेजबानी नहीं, बल्कि अलग-अलग हितों वाले देशों के बीच सहमति बनाने की बड़ी कूटनीतिक परीक्षा भी है।