नई दिल्ली। भारत में जारी विरोध-प्रदर्शनों के पीछे विदेशी फंडिंग को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने दावा किया है कि उन्हें आश्चर्य नहीं होगा यदि भारत में चल रहे कुछ आंदोलनों के पीछे अमेरिकी सरकार का हाथ हो और उन्हें गुप्त रूप से आर्थिक मदद दी जा रही हो। हालांकि, उनके इस दावे के समर्थन में फिलहाल कोई स्वतंत्र रूप से सत्यापित सबूत सामने नहीं आया है।
BRICS और रूस-चीन से रिश्तों को बताया वजह
मार्कंडेय काटजू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी टिप्पणी में भारत की विदेश नीति और BRICS में उसकी भूमिका का उल्लेख किया। उनके अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत के रूस और चीन के साथ संबंध मजबूत हो रहे हैं, जिससे अमेरिका असहज हो सकता है।
काटजू ने इसी संदर्भ में आशंका जताई कि अमेरिका भारत के भीतर असंतोष को बढ़ावा देने के लिए कुछ आंदोलनों को गुप्त रूप से फंड कर सकता है। यह उनका व्यक्तिगत दावा है। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह स्थापित नहीं हुआ है कि भारत में चल रहे मौजूदा प्रदर्शनों को अमेरिकी सरकार से धन मिल रहा है।
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शनों के बीच बयान
यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली समेत कई स्थानों पर प्रदर्शन हुए हैं। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित अनियमितताओं को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे हैं। चुनाव आयोग और भाजपा ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है।
इससे पहले भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने भी कुछ विरोध-प्रदर्शनों के पीछे विदेशी फंडिंग और बाहरी हस्तक्षेप की आशंका जताई थी। उन्होंने सरकार से मामले की जांच कराने की मांग की थी। हालांकि, आरोपों और प्रमाणित निष्कर्षों के बीच अंतर करना जरूरी है।
विदेशी फंडिंग के आरोपों पर जांच की मांग
भारत में विदेशी योगदान प्राप्त करने वाले संगठनों की गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) लागू है। किसी संगठन को विदेशी धन मिलना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है; इसके लिए संबंधित कानून और नियमों का पालन जरूरी है।
फिलहाल काटजू के बयान को एक आशंका और आरोप के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। किसी आंदोलन को विदेशी सरकार से फंडिंग मिलने की पुष्टि के लिए वित्तीय रिकॉर्ड, जांच एजेंसियों के निष्कर्ष या अन्य विश्वसनीय प्रमाण जरूरी होंगे। ऐसे प्रमाण सामने आने तक अमेरिकी सरकार को भारतीय आंदोलनों की फंडिंग से जोड़ने वाले दावे को स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।