मैं गरीब की जोरू, इंदौर नगर पालिक निगम… बताती हूं अपनी व्यथा… इस शहर की जबरदस्त दुर्दशा के पीछे मेरा यहां हो रहा भ्रष्टाचार है। इनका ध्यान राजस्व वसूली पर कम होने से एवं भ्रष्टाचार अधिक होने से निर्माण कार्य गति नहीं पकड़ पा रहे हैं और लोग परेशान हो रहे हैं।
आपने सुना ही होगा कि करोड़ों रुपए के फर्जी बिल पास हो गए। अधिकारियों ने अपने वाहन ही किराए पर लगाकर मुझे लाखों रुपए की चपत लगाई। सबके सब भ्रष्टाचार की गंगा में नहा रहे हैं। हर कोई मुझे लूटने में लगा है।
मेरी नजर उस समय ज्यादा ही झुक जाती है जब कोई निर्माण कार्य केवल भ्रष्टाचार की गरज से खोल लिए जाते हैं। सड़कें बेहद खराब हो रही हैं और फुटपाथों पर पेवर ब्लॉक बदले जाते हैं। उन फुटपाथों पर लोग चलते नहीं, वहां वाहन पार्क किए जाते हैं। यह तो हाल है।
अच्छे-भले डिवाइडर तोड़कर उन्हें दोबारा बनाया जाता है। यह देखकर मैं भूखी भी होती हूं और मुझे शर्म भी आती है। भ्रष्टाचार की भी हद तो हो।
और किसी बात में पार्षदों और अधिकारियों के बीच सहमति हो या न हो, भ्रष्टाचार के मामले में ये एकमत रहते हैं। कोई सुनवाई नहीं, केवल साफ शहर, स्वच्छ शहर का दम भरकर सीना फुलाए घूमने वाले ये नेता-अधिकारी शहर की अन्य दुर्दशा पर ध्यान ही नहीं देते।
ऊपर-ऊपर बेल बटा, नीचे से पेंदा फूटा वाला मामला है। एक तरफ शहर को सबसे स्वच्छ रखने की होड़ है, दूसरी तरफ भ्रष्टाचार की दौड़ है। सब आगे से आगे निकलना चाहते हैं।
बहुत बुरी हालत है… मैं क्या करूं, इनकी नादानियां देखती रहती हूं, क्योंकि मैं पूरे शहर की भाभी हूं!
दीपक शर्मा
चैतन्यलोक