चैतन्यलोक
देश

जयशंकर बोले- भारत को ‘मिडिल पावर’ कहना सीमित सोच, दुनिया में बढ़ रहे रणनीतिक ‘चोक पॉइंट्स’

Author

Akriti sharma

14 Oct 2026 | 11:54 AM
जयशंकर बोले- भारत को ‘मिडिल पावर’ कहना सीमित सोच, दुनिया में बढ़ रहे रणनीतिक ‘चोक पॉइंट्स’

नई दिल्ली। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा है कि भारत को पारंपरिक अर्थों में ‘मिडिल पावर’ यानी मध्यम शक्ति कहना उसकी वास्तविक क्षमता और भविष्य की संभावनाओं को सीमित करके देखने जैसा है। उन्होंने कहा कि दुनिया तेजी से ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है, जहां महत्वपूर्ण संसाधनों, वित्तीय व्यवस्थाओं और आर्थिक निर्भरता पर नियंत्रण देशों के बीच दबाव बनाने का हथियार बनता जा रहा है।

जयशंकर ने बुधवार को नई दिल्ली में आयोजित ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में वैश्विक शक्ति संतुलन और भारत की भूमिका पर अपनी बात रखी। उनके मुताबिक, भारत की बड़ी आबादी, लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था और विकास की संभावनाओं को देखते हुए उसकी वैश्विक भूमिका का आकलन नए नजरिये से किया जाना चाहिए।

क्या हैं दुनिया के ‘चोक पॉइंट्स’?

‘चोक पॉइंट्स’ ऐसे महत्वपूर्ण क्षेत्र, संसाधन या व्यवस्थाएं हैं, जिन पर कुछ देशों का नियंत्रण दूसरे देशों के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है। इनमें महत्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा संसाधन, वित्तीय नेटवर्क, डॉलर आधारित लेनदेन और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध जैसी व्यवस्थाएं शामिल हो सकती हैं।

जयशंकर ने कहा कि अब केवल दुर्लभ खनिजों पर नियंत्रण ही चिंता का विषय नहीं है, बल्कि वित्त और प्रतिबंध भी रणनीतिक दबाव के साधन बन रहे हैं। उन्होंने आगाह किया कि देशों को अपनी नीतियां और राष्ट्रीय हित तय करते समय इन निर्भरताओं को ध्यान में रखना होगा।

भारत को अपने हितों के आधार पर बनाने होंगे फैसले

विदेश मंत्री के अनुसार, बदलती वैश्विक व्यवस्था में देशों को अपने हितों को समझकर स्वतंत्र नीतियां तैयार करनी होंगी। इसके बाद वे दूसरे देशों के साथ आपसी सहमति और साझा लाभ के आधार पर समझौते कर सकते हैं।

जयशंकर ने कहा कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में यह महत्वपूर्ण होगा कि कौन-सा देश बातचीत की मेज पर क्या योगदान दे सकता है और दूसरे देशों के साथ किस तरह के सहयोग विकसित कर सकता है।

बदलाव को लेकर निराशावादी नहीं हैं जयशंकर

जयशंकर ने वैश्विक व्यवस्था में हो रहे बदलावों को लेकर पूरी तरह निराशावादी दृष्टिकोण अपनाने से भी बचने की बात कही। उनका संकेत था कि बढ़ती प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक निर्भरता के बीच भी सहयोग तथा आपसी समझौते के अवसर मौजूद हैं।

उनके बयान से स्पष्ट है कि भारत के लिए भविष्य की चुनौती केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं है। महत्वपूर्ण संसाधनों, वित्तीय व्यवस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों में संतुलन बनाते हुए अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखना भी उतना ही अहम होगा।

टिप्पणियाँ (0)

टिप्पणी करने के लिए लॉग इन या रजिस्टर करें।

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी करें!

होम वीडियो Sports श्रेणियाँ ई-पेपर